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चीन से खतरा, ताइवान ने लगाए F-16

Edited By Shatakshi Asthana |

नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated:

Photo: Roy ChooPhoto: Roy Choo

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ताइवान की एयरफोर्स ने दो मल्टिरोल F-16 फाइटर इस हफ्ते लॉन्च कर दिए। ऐंटी-शिप मिसाइल से लैस से फाइटर हुआलीन एयरफोर्स बेस से लॉन्च किए गए थे। दरअसल, कुछ वक्त पहले यह खबर आई थी कि चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ताइवान के Pratas टापू को कब्जाने के लिए ड्रिल करने वाली है। चीन इस टापू को अपना क्षेत्र Dongsha बताता है।


ये टापू दक्षिण चीन सागर (South China Sea) के उत्तरी हिस्से में आता है। एविएशन रिपोर्टर रॉय चू ने एयरक्राफ्ट की तस्वीरें 5वें टैक्टिकल फाइटर विंग (TFW)से तैनात किए जाने की तस्वीरें शेयर कीं। उनके मुताबिक, ‚5वें TFW के F-16 आमतौर पर हारपून के साथ ऐंटी-शिप मिशन के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं जबकि चौथे TFW के F-16 चियाई एयरफोर्स बेस से AGM-65 मैवरिक मिसाइल के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।‘

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चीन के मिलिट्री एक्सपर्ट ने किया खंडन


आशंका जताई गई है कि एयरक्राफ्ट इस डर से लॉन्च किए गए हैं कि PLA टापू पर कब्जे के लिए युद्धाभ्यास शुरू कर सकता है। इस बारे में ताइवान न्यूज ने मई में रिपोर्ट किया था कि PLA अगस्त में जो ड्रिल करेगा उसमें बड़ी संख्या में मरीन सैनिक, शिप, होवरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर शामिल होंगे। हालांकि, चीन के मिलिट्री एक्सपर्ट ली डागॉन्ग ने इन रिपोर्टों का खंडन किया है।

दक्षिण चीन सागर इसलिए खास

  • दक्षिण चीन सागर इसलिए खास

    दरअसल, दक्षिण चीन सागर में जिस क्षेत्र पर चीन की नजर है वह खनिज और ऊर्जा संपदाओं का भंडार है। चीन का दूसरे देशों से टकराव भी कभी तेल, कभी गैस तो कभी मछलियों से भरे क्षेत्रों के आसपास होता है। चीन एक ‚U‘ शेप की ‚नाइन डैश लाइन‘ के आधार पर क्षेत्र में अपना दावा ठोकता है। इसके अंतर्गत वियतनाम का एक्सक्लूसिव इकनॉमिक जोन (EEZ), परासल टापू, स्प्रैटली टापू, ब्रूने, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलिपीन और ताइवान के EEZ भी आते हैं। हेग स्थित एक ट्राइब्यूनल ने फिलिपील द्वारे दर्ज किए गए केस में 2016 में कहा था कि चीन का इस क्षेत्र पर कोई ऐतिहासिक अधिकार नहीं है और 1982 के UN Convention on the Law of the Sea के बाद इस लाइन को खत्म कर दिया गया था। (तस्वीर: 1995 में स्प्रैटली टापू पर चीन का ढांचा)

  • चीन को फर्क नहीं, अमेरिका ने घेरा

    हालांकि, चीन को इससे कोई फर्क पड़ता नहीं दिखाई दिया है और उसकी ‚आक्रामक‘ गतिविधियां जारी हैं। बीती 13 जुलाई को अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने पहली बार चीन के इस क्षेत्र में दावे को कानून-विरोधी बताया था और पेइचिंग पर आरोप लगाया था कि वह दूसरों को डराने-धमकाने का अभियान चला रहा है। अमेरिका का यह भी कहना है कि ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और भारत ने साउथ चाइना सी में चीन की गतिविधियों से चिंता जताई है जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून खतरे में हैं। (तस्वीर: 2017 में स्प्रैटली टापू पर चीन का ढांचा)

  • वियतनाम को तेल उत्पादन में घाटा

    पिछले साल चीन और वियतनाम के जहाज कई महीनों तक वियतनाम के EEZ में आमने-सामने रहे जब चीन के रिसर्च वेसल ने ऐसी जगह का सीस्मिक सर्वे (Sesmic Survey) किया जिसमें वियतनाम के तेल के ब्लॉक भी आते हैं। तनावपूर्ण स्थिति की वजह से वियतनाम के तेल उत्पादन पर असर पड़ा है। साथ ही यहां काम करने वाले रूस के Rosneft और स्पेन के Repsol के ऑपरेशन पर भी असर पड़ा है। कंसल्टंसी फर्म Wood Mackenzie के रिसर्च डायरेक्टर ऐंड्रू हारवुड का कहना है, ‚हम देख रहे हैं कि वियतनाम में तेल और गैस निवेश की दिलचस्पी में कमी आई है। तनाव बढ़ने से हालात सुधरेंगे नहीं।‘ (तस्वीर: चीनी जहाजों को देखता वियतनाम का जवान)

  • मलेशिया, इंडोनेशिया पर चीन का 'हमला'

    मई में चीन के इसी जहाज ने मलेशिया में भी एक महीने तक डेरा डालकर रखा। यहां भी इसका ठिकाना मलेशिया की सरकारी तेल कंपनी Petronas के ड्रिलशिप के पास था। मलेशिया सरकार का कहना है कि 2016-2019 के बीच चीन ने 89 बार ऐसी गतिविधियों को अंजाम दिया है। इंडोनेशिया ने भी चीन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाना शुरू कर दिया है। जनवरी में जब चीन के जहाज इंडोनेशिया के EEZ में नटूना टापू के पास दाखिल हुए तो जकार्ता ने चीन के राजदूत को समन किया और अपने हवाई और समुद्री पट्रोल को तैनात कर दिया। नटूना टापू नैचरल गैस और मछलियों से भरपूर है और यहां के लोगों का कहना है चीन इस पर नजरें गड़ाए है। (तस्वीर: चीनी जहाज में मिला इंडोनेशियाई जहाजकर्मी का शव)

  • फिलिपीन, वियतनाम ने उठाई आवाज

    वियतनाम इस साल 10 सदस्यों वाले ASEAN (असोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स) की अध्यक्षता कर रहा है। उसका पहले से ही SCS को लेकर चीन से विवाद चल रहा है। 26 जून को हनोई में हुए समिट में वियतनाम और फिलिपीन ने कोरोना वायरस की महामारी की आढ़ में अपना दबदबा कायम कर रहे चीन को लेकर चिंता जताई कि क्षेत्र में असुरक्षा बढ़ रही है। चीन के इस महीने SCS में सैन्य अभ्यास को वियतनाम ने दक्षिणपूर्वी देशों से संबंधों के लिए खराब बताया। फिलिपीन के विदेश मंत्री तियोडोरो लॉक्सिन ने भी कहा है कि चीन के युद्धाभ्यास का कूटनीतक या कैसे भी, कड़ा जवाब दिया जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति ने अमेरिका के साथ दो दशकों के लिए किए सैन्य समझौते को खत्म करने का फैसला भी टाल दिया। (तस्वीर: ताइवान का युद्धाभ्यास)


इसलिए दक्षिण चीन सागर पर चीन की नजर


दक्षिण चीन सागर में जिस क्षेत्र पर चीन की नजर है वह खनिज और ऊर्जा संपदाओं का भंडार है। चीन का दूसरे देशों से टकराव भी कभी तेल, कभी गैस तो कभी मछलियों से भरे क्षेत्रों के आसपास होता है। चीन एक ‚U‘ शेप की ‚नाइन डैश लाइन‘ के आधार पर क्षेत्र में अपना दावा ठोकता है। इसके अंतर्गत वियतनाम का एक्सक्लूसिव इकनॉमिक जोन (EEZ), परासल टापू, स्प्रैटली टापू, ब्रूने, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलिपीन और ताइवान के EEZ भी आते हैं।

फिलिपींस ने की थी चीन की शिकायत

  • फिलिपींस ने की थी चीन की शिकायत

    22 जनवरी 2013 को रिपब्लिक ऑफ फिलिपींस ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की समुद्री कानून संधि (United Nations Convention on the Law of the Sea, the Convention) के Annex VII के तहत विवाचक कार्यवाही (Arbitral Proceedings) शुरू कीं। इसका संबंध साउथ चाइना सी में ऐतिहासिक अधिकारों और समुद्री हकदारी, समुद्र से जुड़ी कुछ खास बातों के स्टेटस और चीन की हरकतों की वैधता जांचने से था। इस विवाद पर फैसला करने के लिए ट्राइब्यूनल को 21 जून, 2013 को बनाया गया। इसकी अध्यक्षता घाना के जज थॉमस मेंसा ने की जबकि फ्रांस के जज जीन-पियरी कॉट, पोलैंड के जज स्टैनिस्लॉ पॉलॉक, नीदरलैंड्स के प्रफेसर अल्फ्रेड सून्स और जर्मनी के जज रूडीगर वॉल्फ्रम इसमें शामिल थे। पर्मानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने इसमें रजिस्ट्री की भूमिका भी निभाई।

  • चीन ने कोर्ट पर ही किया सवाल

    फिलिपींस ने आरोप लगाया था कि चीन की हरकतों से कन्वेन्शन का उल्लंघन हो रहा है। चीन ने इस कार्यवाही को नहीं मानने और इसमें शामिल नहीं होने का फैसला किया। इसके चलते Annex VII के तहत दिए गए प्रावधान के मुताबिक, ‚किसी पार्टी की गैरमौजूदगी या उसके अपना बचाव नहीं कर पाने की स्थिति में भी कार्यवाही रोकी नहीं जाएगी।‘ चीन ने यह भी दावा किया था कि कोर्ट के पास इस मुद्दे पर सुनवाई का अधिकार नहीं है लेकिन कन्वेन्शन के मुताबिक ही अधिकारक्षेत्र को लेकर भी अलग से सुनवाई हुई और पाया गया कि कोर्ट इस पर सुनवाई कर सकता है।

  • 'कन्वेन्शन में खारिज हुए चीन के अधिकार'

    अपने फैसले में कोर्ट ने यह बात साफ कही है कि कार्यवाही के दौरान ट्राइब्यूनल ने ऐतिहासिक अधिकारों और हकदारी को लेकर जांच की। इसमें पाया गया कि कन्वेन्शन में ही समुद्री इलाकों पर अधिकार तय किए गए थे और किसी भी संसाधन पर पहले से चले आ रहे अधिकारों की रक्षा करने की बात पर विचार किया गया था लेकिन उन्हें कन्वेन्शन में शामिल नहीं किया गया था। इसलिए चीन का दक्षिण चीन सागर के संसाधनों पर जो अधिकार था, वह जहां तक कन्वेन्शन में दिए गए एक्सक्लूसिव इकनॉमिक जोन से मुताबिक नहीं था और वहां उन्हें खत्म कर दिया गया था।

  • 'कभी नहीं था चीन का एकाधिकार'

    ट्राइब्यूनल ने यह भी कहा था कि पहले दूसरे स्टेट्स के साथ-साथ चीनी मछुआरों और नैविगेशन के लिए दक्षिण चीन सागर के टापुओं का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन इस बात का सबूत नहीं है कि चीन का यहां के संसाधनों पर एकाधिकार था। ट्राइब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि चीन के पास 9 डैश लाइन के अंदर के संसाधनों पर कानूनी अधिकार नहीं है। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी पाया कि चीन जिन फीचर्स का हवाला अपने एक्सक्लूसिव इकनॉमिक जोन के लिए दे रहा है, उसके मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। कोर्ट ने कहा कि कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जो फिलिपींस के EEZ में आते हैं क्योंकि वहां चीन का अधिकार नहीं है।

  • 'चीन की हरकतों से खतरा'

    सबसे बड़ा फैसला चीन की गतिविधियों को लेकर था। ट्राइब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि चीन ने फिलिपींस के EEZ में उसके संप्रभुत्व अधिकारों का उल्लंन किया है, फिलीपन के फिशिंग और पेट्रोल ऑपरेशन में दखल दिया है, कृत्रिम टापू बनाए हैं और चीनी मछुआरों को यहां मछली पकड़ने से नहीं रोका है। यहां तक कि चीन के जहाजों ने फिलिपींस के जहाजों को रोकर टक्कर का खतरा भी पैदा कर दिया है।

  • अब फिलिपींस पीछ खींच रहा कदम

    हालांकि, हाल ही में फिलिपींस के राष्ट्रपति रॉड्रीगो दुतर्ते ने कहा है कि फिलिपींस साउथ चाइना सी में चीन से टक्कर नही लेगा। उन्होंने जंग में जाने से बेहतर कूटनीति है और फिलिपींस जंग में जाने की कीमत नहीं चुका सकता। उन्होंने अपना दावा तो नहीं छोड़ा है लेकिन साफ कहा है कि चीन के पास हथियार हैं, तो हक भी उसका है। खास बात यह है कि रॉड्रीगो ने अमेरिका को अपने यहां सैन्य बेस लगाने की इजाजत देने से फिलहाल पैर पीछे खींच लिए हैं क्योंकि उनका मानना है कि जंग की स्थिति में नुकसान फिलीपींस का होगा।


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